इरान और इराक के बीच बढ़ता तनाव और मिडिल ईस्ट का नया संकट

इरान और इराक के बीच बढ़ता तनाव और मिडिल ईस्ट का नया संकट

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबरों के बीच मिडिल ईस्ट की आग अब इराक तक पहुंच चुकी है। ये कोई मामूली सैन्य कार्रवाई नहीं है। तेहरान ने इराक के उत्तरी इलाकों में एक के बाद एक कई मिसाइलें दागकर पूरी दुनिया को चौंका दिया है। जब किसी देश का शीर्ष नेतृत्व संकट में होता है, तो उसका गुस्सा अक्सर पड़ोसियों पर फूटता है। ईरान ने ठीक यही किया। उसने कुर्दिस्तान क्षेत्र में मौजूद ठिकानों को निशाना बनाया है। दावा ये है कि वहां इजरायली जासूसी एजेंसियां और ईरान विरोधी गुट सक्रिय थे। लेकिन असल कहानी कुछ और ही है।

ईरान इस वक्त अंदरूनी उथल-पुथल से गुजर रहा है। खामेनेई की सेहत और उनके उत्तराधिकार को लेकर चल रही अटकलों ने देश के भीतर एक वैक्यूम पैदा कर दिया है। जब सत्ता की पकड़ ढीली पड़ती है, तो सेना और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) अपनी ताकत दिखाने के लिए बाहरी दुश्मनों को ढूंढते हैं। इराक का एरबिल शहर इस बार उनकी रडार पर आ गया। बैलिस्टिक मिसाइलों का ये हमला सिर्फ बदला नहीं, बल्कि एक संदेश है। तेहरान ये बताना चाहता है कि नेतृत्व बदले या न रहे, उसकी आक्रामक नीतियां नहीं बदलेंगी।

इराक पर मिसाइल हमलों के पीछे का असली खेल

ईरान ने आधिकारिक तौर पर कहा कि उसने 'आतंकवादी ठिकानों' को नष्ट किया है। इराक के एरबिल में हुए इन धमाकों ने रिहाइशी इलाकों को भी हिला कर रख दिया। क्या वाकई वहां मोसाद के ठिकाने थे? या फिर ये सिर्फ अपनी जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश थी? सच तो ये है कि इराक लंबे समय से ईरान और अमेरिका के बीच सैंडविच बना हुआ है। ईरान को लगता है कि इराक की धरती का इस्तेमाल उसके खिलाफ साजिश रचने के लिए हो रहा है।

जब खामेनेई की मौत जैसी खबरें फैलती हैं, तो ईरान के कट्टरपंथी धड़े को लगता है कि दुश्मन देश इस कमजोरी का फायदा उठा सकते हैं। ऐसे में 'प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक' यानी पहले हमला करने की रणनीति अपनाई जाती है। इन मिसाइलों ने न केवल इमारतों को गिराया, बल्कि बगदाद और तेहरान के कूटनीतिक रिश्तों में भी गहरी दरार पैदा कर दी है। इराक ने इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया है। लेकिन क्या इराक के पास ईरान को रोकने की ताकत है? शायद नहीं।

खामेनेई के बाद का ईरान और क्षेत्रीय अस्थिरता

अयातुल्ला अली खामेनेई सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि ईरान की इस्लामी व्यवस्था का स्तंभ रहे हैं। उनके बिना ईरान की विदेश नीति कैसी होगी, इसका ट्रेलर इन मिसाइल हमलों में दिखता है। IRGC अब ज्यादा स्वायत्त होकर फैसले ले रही है। उन्हें किसी नागरिक सरकार की परवाह नहीं है। इराक पर हमले का फैसला सीधे मिलिट्री कमांड से आया लगता है।

मिडिल ईस्ट के जानकारों का मानना है कि ईरान अब ज्यादा अनप्रेडिक्टेबल हो गया है। पहले एक तय प्रोटोकॉल होता था, लेकिन अब गुस्सा और बौखलाहट फैसलों पर हावी है। सीरिया से लेकर लेबनान तक फैले ईरान के प्रॉक्सी नेटवर्क भी अब ज्यादा सक्रिय हो गए हैं। इराक पर दागी गई मिसाइलें ये साबित करती हैं कि ईरान अपनी सीमाओं के बाहर युद्ध लड़ने में जरा भी नहीं हिचकिचाएगा। उसे परवाह नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय क्या सोचता है।

क्या ये एक बड़े युद्ध की शुरुआत है

युद्ध रातों-रात नहीं छिड़ते। उनकी जमीन धीरे-धीरे तैयार होती है। ईरान का इराक में हस्तक्षेप नया नहीं है, लेकिन मिसाइलों का इस तरह इस्तेमाल करना खतरे की घंटी है। अमेरिका ने इन हमलों की निंदा की है। मगर निंदा से मिसाइलें नहीं रुकतीं। इराक के भीतर मौजूद अमेरिकी बेस भी अब सीधे खतरे में हैं। अगर ईरान अपनी बौखलाहट में किसी अमेरिकी ठिकाने को निशाना बनाता है, तो जवाबी कार्रवाई भीषण होगी।

हकीकत ये है कि ईरान इस वक्त घायल शेर की तरह व्यवहार कर रहा है। उसकी अर्थव्यवस्था प्रतिबंधों से चरमराई हुई है। लोग सड़कों पर हैं। नेतृत्व संकट में है। ऐसे में युद्ध ही एक ऐसा रास्ता बचता है जो राष्ट्रवाद की भावना को भड़काकर सत्ता को बचाए रख सकता है। इराक तो बस एक मोहरा है। असली लड़ाई तेहरान के गलियारों में चल रही सत्ता की जंग है।

सुरक्षा के लिहाज से अब क्या बदलेगा

इस तनाव का सीधा असर ग्लोबल मार्केट और तेल की कीमतों पर पड़ेगा। अगर ईरान और इराक के बीच संघर्ष बढ़ता है, तो होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में सप्लाई चेन बाधित हो सकती है। भारत जैसे देशों के लिए ये चिंता का विषय है क्योंकि हमारी ऊर्जा सुरक्षा इस क्षेत्र पर निर्भर है। हमें अपनी कूटनीति को अब और ज्यादा सक्रिय करना होगा।

अब आगे क्या होगा? नजरें ईरान के अगले कदम पर होनी चाहिए। क्या वो इराक के अंदर और गहरे हमले करेगा? या फिर ये सिर्फ एक बार की कार्रवाई थी? फिलहाल, इराक ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का दरवाजा खटखटाया है। पर इतिहास गवाह है कि सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव ईरान जैसी ताकतों को नहीं रोक पाते। इस क्षेत्र में शांति अब एक सपना जैसी लगती है।

आने वाले दिनों में रक्षा विशेषज्ञों को इरान की मिसाइल यूनिट्स की मूवमेंट पर नजर रखनी चाहिए। एरबिल में जो हुआ, वो सीरिया या जॉर्डन की सीमा पर भी दोहराया जा सकता है। अपनी सुरक्षा तैयारियों को पुख्ता करना और मिडिल ईस्ट में रह रहे नागरिकों के लिए इमरजेंसी प्लान तैयार रखना ही इस वक्त समझदारी है।

KF

Kenji Flores

Kenji Flores has built a reputation for clear, engaging writing that transforms complex subjects into stories readers can connect with and understand.