अमेरिका और चीन ने हॉर्मुज संकट पर एक साथ आकर सबको चौंका दिया

अमेरिका और चीन ने हॉर्मुज संकट पर एक साथ आकर सबको चौंका दिया

ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं और हॉर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव ने दुनिया के दो सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वियों को एक मेज पर ला खड़ा किया है। वाशिंगटन और बीजिंग के बीच की तल्खी किसी से छिपी नहीं है, लेकिन जब बात ग्लोबल ऑयल सप्लाई और परमाणु प्रसार की आती है, तो समीकरण बदल जाते हैं। अभी जो खबरें आ रही हैं, वे साफ इशारा करती हैं कि अमेरिका और चीन ने ईरान को कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने दो टूक कह दिया है कि तेहरान को कभी भी परमाणु हथियार बनाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं है, बल्कि उस हॉर्मुज संकट का सीधा असर है जिसने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिलाने का जोखिम पैदा कर दिया है।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य का असली गणित समझिए

दुनिया का करीब 20% कच्चा तेल इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। अगर ईरान इसे ब्लॉक करने की कोशिश करता है, जैसा कि वह अक्सर धमकी देता रहता है, तो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है। उसकी ऊर्जा सुरक्षा सीधे तौर पर इस क्षेत्र की स्थिरता से जुड़ी है। अमेरिका भले ही खुद तेल का बड़ा उत्पादक बन गया हो, लेकिन वह अपने सहयोगियों की सुरक्षा और वैश्विक कीमतों में उछाल को बर्दाश्त नहीं कर सकता। इसी वजह से जो दो देश ट्रेड वॉर और ताइवान के मुद्दे पर भिड़े रहते हैं, वे ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर एक सुर में बोल रहे हैं।

ईरान का परमाणु कार्यक्रम अब उस मोड़ पर है जहाँ से पीछे मुड़ना मुश्किल दिखता है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की रिपोर्ट्स बताती हैं कि यूरेनियम संवर्धन का स्तर अब हथियार बनाने के बेहद करीब पहुँच चुका है। अमेरिका को डर है कि एक परमाणु संपन्न ईरान पूरे मध्य पूर्व में हथियारों की रेस शुरू कर देगा। सऊदी अरब और यूएई जैसे देश भी चुप नहीं बैठेंगे। चीन के लिए यह एक अलग तरह का सिरदर्द है। वह नहीं चाहता कि मिडिल ईस्ट में कोई बड़ी जंग हो, क्योंकि उसका "बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव" (BRI) इस क्षेत्र की शांति पर टिका है।

ईरान की घेराबंदी में चीन का बदला हुआ रुख

अतीत में चीन अक्सर ईरान का बचाव करता रहा है। उसने ईरान से तेल खरीदा और उसे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के खिलाफ एक तरह का लाइफलाइन दिया। लेकिन अब स्थिति अलग है। ईरान की हॉर्मुज में बढ़ती आक्रामकता ने चीन के धैर्य को परखना शुरू कर दिया है। जब ईरान समर्थित हूतियों ने लाल सागर में जहाजों पर हमले शुरू किए, तो उसका असर चीन के व्यापारिक रूट पर भी पड़ा। बीजिंग को समझ आ गया है कि अगर ईरान को पूरी छूट दी गई, तो यह उसके अपने आर्थिक हितों के खिलाफ जाएगा।

अमेरिका ने इस स्थिति का चतुराई से फायदा उठाया है। बाइडन प्रशासन ने बीजिंग को यह समझाने में सफलता हासिल की है कि एक अस्थिर ईरान किसी के हक में नहीं है। हालिया वार्ताओं में दोनों देशों ने सहमति जताई है कि परमाणु समझौते (JCPOA) को फिर से जीवित करने या एक नया फ्रेमवर्क तैयार करने की जरूरत है। ईरान को यह अहसास कराना जरूरी है कि वह परमाणु बम बनाकर अपनी सुरक्षा नहीं बढ़ाएगा, बल्कि और ज्यादा अलग-थलग पड़ जाएगा।

क्या यह गठबंधन टिक पाएगा

सवाल उठता है कि क्या अमेरिका और चीन का यह 'अजीब सा साथ' लंबे समय तक चलेगा। हकीकत यह है कि दोनों के पास एक-दूसरे पर भरोसा करने की कोई ठोस वजह नहीं है। लेकिन ईरान का मुद्दा उन चुनिंदा क्षेत्रों में से एक है जहाँ उनके हित टकराने के बजाय मेल खाते हैं। चीन को सस्ती ऊर्जा चाहिए और अमेरिका को क्षेत्रीय स्थिरता। ईरान इसी का फायदा उठाकर अब तक खेलता रहा है, लेकिन जब बड़े खिलाड़ी एक साथ आ जाएं, तो खेल के नियम बदल जाते हैं।

ईरान ने अब तक अपनी रणनीति "मैक्सिमम प्रेशर" के जवाब में "मैक्सिमम रेजिस्टेंस" पर रखी है। वह सोचता है कि रूस और चीन का समर्थन उसे अमेरिका के प्रतिबंधों से बचा लेगा। रूस तो अभी यूक्रेन में फंसा है, लेकिन चीन का रुख बदलना तेहरान के लिए बड़ा झटका है। अगर बीजिंग ने ईरान से तेल की खरीद कम कर दी या भुगतान के तरीकों को और कड़ा कर दिया, तो ईरानी अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह सकती है।

क्षेत्रीय ताकतों की अपनी चिंताएं

सऊदी अरब और इजरायल इस पूरे घटनाक्रम को बहुत गौर से देख रहे हैं। इजरायल ने बार-बार कहा है कि वह ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए सैन्य कार्रवाई से भी पीछे नहीं हटेगा। अमेरिका नहीं चाहता कि उसे एक और युद्ध में घसीटा जाए। इसलिए वह कूटनीति के जरिए दबाव बनाना चाहता है। चीन का साथ मिलने से इस कूटनीति को वह ताकत मिलती है जो अमेरिका अकेले कभी नहीं जुटा सकता था।

हॉर्मुज संकट ने यह भी दिखाया है कि ईरान अब केवल अमेरिका का दुश्मन नहीं रह गया है, बल्कि वह उन देशों के लिए भी परेशानी खड़ा कर रहा है जो उसके दोस्त कहे जाते थे। जब आपके जहाज सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो दोस्ती का क्या मोल? यही वजह है कि बीजिंग अब वाशिंगटन की भाषा बोल रहा है।

ईरान के पास क्या विकल्प बचे हैं

तेहरान अब एक चौराहे पर खड़ा है। या तो वह अपनी परमाणु जिद छोड़कर अंतरराष्ट्रीय मुख्यधारा में वापस आए, या फिर चीन जैसे पार्टनर को भी खोने के लिए तैयार रहे। उसे समझना होगा कि हॉर्मुज की नाकेबंदी की धमकी अब काम नहीं करने वाली। दुनिया अब ऊर्जा के अन्य विकल्पों पर भी काम कर रही है, और ईरान का यह पुराना हथियार अब कुंद पड़ चुका है।

चीन और अमेरिका का यह संदेश साफ है—परमाणु हथियार नहीं। इसका मतलब है कि ईरान को अपनी संवर्धन गतिविधियों पर रोक लगानी होगी और पारदर्शी तरीके से अपनी परमाणु साइट्स की जांच करानी होगी। अगर वह ऐसा नहीं करता है, तो आने वाले महीनों में हम ईरान पर और भी कड़े प्रतिबंध देख सकते हैं, जिसमें इस बार चीन का मौन समर्थन या सक्रिय भागीदारी भी शामिल हो सकती है।

अब आगे क्या होगा

आने वाले हफ्तों में वियना या किसी अन्य तटस्थ स्थान पर बातचीत का नया दौर शुरू हो सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि ईरान इस संयुक्त दबाव को कैसे लेता है। क्या वह फिर से बातचीत की मेज पर आएगा या अपनी आक्रामकता को और बढ़ाएगा? मिडिल ईस्ट के देशों के लिए भी यह एक राहत की बात हो सकती है कि कम से कम महाशक्तियां इस एक मुद्दे पर एकजुट हैं।

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ईरान के आम लोगों के लिए यह स्थिति सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रही जनता के लिए प्रतिबंधों का जारी रहना किसी सजा से कम नहीं है। सरकार को फैसला करना होगा कि उसकी प्राथमिकता परमाणु बम है या अपने नागरिकों की खुशहाली। कूटनीति की दुनिया में कुछ भी स्थाई नहीं होता, लेकिन फिलहाल अमेरिका और चीन की यह जुगलबंदी ईरान के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।

हॉर्मुज में तैनात नौसैनिक जहाजों की हलचल और परमाणु संयंत्रों के बढ़ते सेंट्रीफ्यूज के बीच अब गेंद ईरान के पाले में है। उसे यह समझना होगा कि अमेरिका और चीन का एक साथ आना केवल संयोग नहीं, बल्कि बदलती हुई वैश्विक व्यवस्था की जरूरत है। अगर वह अब भी नहीं संभलता, तो हॉर्मुज की लहरें उसके लिए और भी खतरनाक साबित हो सकती हैं।

अगला कदम अब तेहरान को उठाना है। या तो समझौता करके अपनी डूबती अर्थव्यवस्था को बचाए या फिर इस दोहरे दबाव के नीचे दबने के लिए तैयार रहे। समय तेजी से निकल रहा है और हॉर्मुज की शांति पूरे विश्व के हित में है।

IG

Isabella Gonzalez

As a veteran correspondent, Isabella Gonzalez has reported from across the globe, bringing firsthand perspectives to international stories and local issues.