ईरान का दावा था कि उसका आसमान कोई भेद नहीं सकता। तेहरान के चारों ओर रूस से मिले S-300 मिसाइल सिस्टम की ऐसी दीवार है जिसे पार करना नामुमकिन है। लेकिन हालिया हकीकत कुछ और ही निकली। इजरायली लड़ाकू विमानों ने न केवल इस सुरक्षा घेरे को तोड़ा, बल्कि ईरान के सबसे आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम की धज्जियां उड़ा दीं। यह कोई इत्तेफाक नहीं था। यह एक सोची-समझी सैन्य रणनीति का हिस्सा था जिसने दुनिया को बता दिया कि तकनीक के मामले में इजरायल का मुकाबला करना कितना मुश्किल है।
ईरानी डिफेंस सिस्टम के तबाह होने के जो वीडियो सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। उनमें साफ दिख रहा है कि कैसे पलक झपकते ही करोड़ों डॉलर की मशीनें कबाड़ में बदल गईं। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर ईरान की 'ढाल' फेल क्यों हो गई? इसका सीधा जवाब है इजरायल की इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और लॉन्ग-रेंज स्ट्राइक क्षमता। इजरायल ने सीधे ईरान के घर में घुसकर मारा और ईरान को पता तक नहीं चला।
रूसी S-300 की विफलता का असली सच
ईरान अपनी सुरक्षा के लिए काफी हद तक रूसी मूल के S-300 PMU2 सिस्टम पर निर्भर था। कागजों पर यह दुनिया के बेहतरीन इंटरसेप्टर्स में से एक है। यह एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है और 200 किलोमीटर की दूरी तक हमला कर सकता है। लेकिन इजरायल ने इसे खिलौना साबित कर दिया। जब इजरायली वायुसेना (IAF) ने हमला किया, तो उन्होंने सबसे पहले इन सिस्टम्स के 'कान और आंख' यानी उनके रेडार को निशाना बनाया।
बिना रेडार के मिसाइल सिस्टम अंधा हो जाता है। इजरायल ने 'रैम्पेज' (Rampage) और 'रॉक्स' (Rocks) जैसी लंबी दूरी की हवा से जमीन पर मार करने वाली मिसाइलों का इस्तेमाल किया। ये मिसाइलें रडार की पकड़ में नहीं आतीं या इतनी तेज होती हैं कि डिफेंस सिस्टम को रिएक्शन का टाइम ही नहीं मिलता। ईरान के रडार स्क्रीन पर जब तक खतरा दिखता, तब तक उनके लॉन्चर मलबे में बदल चुके थे। यह रूस के डिफेंस एक्सपोर्ट के लिए भी एक बड़ा झटका है क्योंकि दुनिया देख रही है कि उनके सबसे भरोसेमंद सिस्टम पश्चिम की तकनीक के सामने टिक नहीं पा रहे।
स्टेल्थ तकनीक और जैमिंग का घातक मेल
इजरायल के पास F-35 'अदिर' (Adir) जैसे स्टेल्थ फाइटर जेट्स हैं। ये विमान रडार को चकमा देने में माहिर हैं। लेकिन इस हमले में सिर्फ विमानों का कमाल नहीं था। इजरायल ने बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग का सहारा लिया। उन्होंने ईरान के रडार फ्रीक्वेंसी को शोर (noise) से भर दिया। सोचिए आप किसी को पुकार रहे हों और आसपास सौ लाउडस्पीकर बजने लगें। ईरान के ऑपरेटरों के साथ यही हुआ। वे अपने ही सिस्टम को समझ नहीं पाए।
- इजरायल ने फेक टारगेट यानी डिकॉय का इस्तेमाल किया ताकि ईरान अपनी कीमती मिसाइलें फालतू के निशानों पर दाग दे।
- जैसे ही ईरान के लॉन्चर खाली हुए, इजरायल ने असली मिसाइलें दाग दीं।
- साइबर अटैक के जरिए ईरान के कमांड और कंट्रोल सेंटर को कुछ मिनटों के लिए सुस्त कर दिया गया।
ईरान ने बार-बार कहा कि उसने अधिकांश मिसाइलों को मार गिराया है। लेकिन सैटेलाइट तस्वीरें झूठ नहीं बोलतीं। परचिन और खोजीर जैसे संवेदनशील इलाकों की तस्वीरों में जले हुए निशान और तबाह हुए लॉन्चर साफ देखे जा सकते हैं। ईरान के लिए यह सिर्फ सैन्य नुकसान नहीं, बल्कि एक बड़ी मनोवैज्ञानिक हार है।
क्या अब ईरान का आसमान पूरी तरह असुरक्षित है
इस हमले ने एक खतरनाक मिसाल कायम कर दी है। ईरान ने दशकों तक अपनी मिसाइल ताकत और एयर डिफेंस का हौवा खड़ा किया था। अब वह गुब्बारा फूट चुका है। अगर इजरायल एक ही रात में ईरान के सबसे सुरक्षित ठिकानों के रडार सिस्टम को खत्म कर सकता है, तो इसका मतलब है कि पूरा ईरान अब इजरायली जेट्स की जद में है। बिना एयर डिफेंस के, ईरान के परमाणु केंद्र और तेल रिफाइनरियां अब आसान निशाना बन सकती हैं।
ईरान अब अपनी सुरक्षा के लिए रूस की तरफ देख रहा है। उसे उम्मीद है कि शायद S-400 सिस्टम उसे बचा ले। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक बुनियादी तकनीक और सॉफ्टवेयर अपडेट नहीं होते, तब तक सिर्फ नए लॉन्चर खरीदने से कुछ नहीं होगा। इजरायल की ताकत सिर्फ उसके हथियारों में नहीं, बल्कि उसके खुफिया तंत्र (Mossad) में भी है। उन्हें पता था कि रडार कहां रखे हैं और उन्हें ऑपरेट कौन कर रहा है।
ईरान के लिए आगे का रास्ता और सुरक्षा की चुनौतियां
अब ईरान को अपने पूरे डिफेंस डॉक्ट्रिन को बदलना होगा। उसे समझ आ गया है कि सिर्फ संख्या बल से काम नहीं चलेगा। उसे अपनी साइबर सुरक्षा और जैमिंग रोधी क्षमता बढ़ानी होगी। लेकिन इसमें सालों लगेंगे और अरबों डॉलर खर्च होंगे। इजरायल ने फिलहाल एक छोटा ट्रेलर दिखाया है। अगर तनाव और बढ़ता है, तो नुकसान की भरपाई करना ईरान के बस की बात नहीं होगी।
ईरान को अपनी सीमाओं के भीतर रडार स्टेशन और मिसाइल बैटरी के प्लेसमेंट को फिर से सोचना पड़ेगा। इजरायल ने दिखा दिया कि वो इराक या सीरिया की हवाई सीमा का इस्तेमाल किए बिना भी ईरान पर सटीक हमला कर सकता है। यह तकनीक की वह बढ़त है जिसे ईरान फिलहाल कम करने की स्थिति में नहीं है। आने वाले समय में हमें और अधिक अंडरग्राउंड फैसिलिटी और मोबाइल डिफेंस यूनिट्स देखने को मिल सकती हैं, लेकिन इजरायली सैटेलाइट सर्विलांस के दौर में कुछ भी छिपाना लगभग नामुमकिन है। ईरान को अब कूटनीति या फिर अपनी पूरी सैन्य मशीनरी के ओवरहॉल में से एक को चुनना ही होगा।