अमेरिका ने जब पाकिस्तान के एबटाबाद में घुसकर ओसामा बिन लादेन को ढेर किया, तो पूरी दुनिया सन्न रह गई थी। किसी को कानो-कान खबर नहीं हुई। अब सालों बाद ईरान के साथ जारी तनाव में कुछ ऐसी ही रणनीति दिखाई दे रही है। अमेरिका ने एक बार फिर वही पुराना दांव चला है जिसने अल-कायदा की कमर तोड़ी थी। अगर आप न्यूज़ हेडलाइंस को ध्यान से देखेंगे, तो आपको समझ आएगा कि ये महज़ इत्तेफाक नहीं है। वाशिंगटन ने ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य और खुफिया बिसात बिल्कुल उसी तर्ज पर बिछाई है जैसे उसने 2011 में लादेन के लिए बिछाई थी।
ईरान और ओसामा बिन लादेन के मामले में अमेरिका की कार्रवाई के बीच क्या समानताएं हैं? ये सवाल आजकल हर सुरक्षा एक्सपर्ट की जुबान पर है। दरअसल, अमेरिका ने दोनों ही मौकों पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' की मानसिकता के साथ काम किया। इसमें सबसे बड़ी बात थी सूचना की सटीकता और ऑपरेशन की गोपनीयता। ईरान के टॉप कमांडर कासिम सुलेमानी की हत्या हो या हालिया खुफिया ऑपरेशन, अमेरिका ने साबित किया है कि वो दुश्मन के घर में घुसकर मारने का हुनर नहीं भूला है।
खुफिया जानकारी का वो जाल जिसने ओसामा और ईरान दोनों को घेरा
ओसामा बिन लादेन को पकड़ने के लिए अमेरिका ने सालों तक 'सिगिन' (SIGINT) और 'ह्यूमिन' (HUMINT) का इस्तेमाल किया। उसने कूरियरों का पीछा किया और सैटेलाइट्स से एबटाबाद वाली उस बिल्डिंग की हर ईंट पर नज़र रखी। ईरान के मामले में भी बिल्कुल यही हो रहा है। अमेरिका और उसके सहयोगी देश ईरान के परमाणु ठिकानों और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) की हर हरकत को ट्रैक कर रहे हैं।
जब सुलेमानी को मारा गया, तब भी अमेरिका को पता था कि वो किस समय, किस फ्लाइट से और किस गाड़ी में होगा। ये वही लेवल की इंटेलिजेंस है जो लादेन के खात्मे के दौरान देखी गई थी। अमेरिका ने ईरान के अंदर अपना ऐसा नेटवर्क तैयार कर लिया है जो अंदरूनी जानकारी बाहर ला रहा है। ये नेटवर्क इतना मजबूत है कि ईरान के सबसे सुरक्षित इलाकों में भी धमाके हो रहे हैं या उनके वैज्ञानिक निशाना बन रहे हैं।
स्टील्थ तकनीक और ड्रोन का बेखौफ इस्तेमाल
एबटाबाद ऑपरेशन में अमेरिका ने ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टरों के ऐसे वर्जन इस्तेमाल किए थे जो रडार की पकड़ में नहीं आते। ईरान के खिलाफ भी अमेरिका ने अपनी इसी ताकत का प्रदर्शन किया है। आज के समय में ये काम ड्रोन कर रहे हैं। एमक्यू-9 रीपर जैसे ड्रोन ने ईरान के कमांडरों को वैसे ही टारगेट किया जैसे कभी ड्रोन स्ट्राइक्स ने अल-कायदा के लीडरों को खत्म किया था।
अमेरिका अपनी सेना को सीधे युद्ध में झोंकने के बजाय 'प्रिसिजन स्ट्राइक' पर भरोसा कर रहा है। वो नहीं चाहता कि एक और लंबी जंग छिड़े। इसके बजाय, वो उन चेहरों को खत्म कर रहा है जो ईरान की सैन्य शक्ति के स्तंभ हैं। लादेन के समय मकसद एक चेहरे को खत्म करना था ताकि संगठन बिखर जाए। ईरान के मामले में मकसद उनकी रणनीतिक बढ़त को पंगु बनाना है।
संप्रभुता को दरकिनार करने का वो सख्त रवैया
अमेरिका ने लादेन को मारने के लिए पाकिस्तान की सीमा का उल्लंघन किया। उसने पाकिस्तान को बताया तक नहीं क्योंकि उसे डर था कि खबर लीक हो जाएगी। ईरान के मामले में भी अमेरिका ने सीरिया और इराक की धरती पर ईरानी ठिकानों को निशाना बनाते वक्त किसी की परवाह नहीं की। जब बात अपनी नेशनल सिक्योरिटी की आती है, तो वाशिंगटन किसी भी देश की सरहदों को अपनी कार्रवाई के बीच नहीं आने देता।
ये एक कड़ा संदेश है। अमेरिका ने दुनिया को बता दिया है कि अगर आप उसकी हिट लिस्ट में हैं, तो आप कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। चाहे वो पाकिस्तान की एक सुरक्षित छावनी के पास बना बंगला हो या तेहरान की कड़ी सुरक्षा वाली सड़कें।
क्या ईरान के साथ भी वैसा ही अंजाम होगा
ईरान कोई छोटा आतंकवादी संगठन नहीं है। वो एक मुल्क है। उसकी अपनी सेना है और उसके पास प्रॉक्सी वॉर लड़ने की गजब की क्षमता है। लेकिन अमेरिका ने लादेन के अंत से जो सीखा, उसे वो अब ईरान पर लागू कर रहा है। वो ईरान को आर्थिक रूप से तोड़ रहा है और साथ ही उसके सैन्य नेतृत्व को मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर कर रहा है।
जब लादेन मरा, तो अल-कायदा कमजोर पड़ा लेकिन खत्म नहीं हुआ। ईरान के साथ भी यही चुनौती है। अमेरिका जानता है कि वो पूरी ईरानी हुकूमत को एक रात में नहीं बदल सकता। इसलिए वो 'स्लो पॉइजन' वाली तकनीक अपना रहा है। हर स्ट्राइक के साथ ईरान की साख कम हो रही है।
बदलते दौर की नई रणनीति
ईरान के साथ जारी इस खींचतान में एक और चीज़ साफ़ है। अमेरिका अब 'बूट्स ऑन द ग्राउंड' यानी अपनी फौज जमीन पर उतारने से बच रहा है। लादेन के वक्त उसने नेवी सील्स भेजी थीं, अब वो साइबर अटैक और ड्रोन का सहारा ले रहा है। ईरान के पावर ग्रिड्स और न्यूक्लियर सेंटर्स पर होने वाले 'स्टक्सनेट' जैसे साइबर हमले इसी का हिस्सा हैं।
ईरान को ये समझना होगा कि अमेरिका का ये 'एबटाबाद मॉडल' उसके लिए कितना घातक हो सकता है। अगर खुफिया जानकारी लीक होती रही और अमेरिका इसी तरह पिनपॉइंट अटैक करता रहा, तो ईरान का हाल भी वैसा ही हो सकता है जैसा कभी लादेन के नेटवर्क का हुआ था।
अमेरिका की ये रणनीति साफ़ है कि वो सीधे युद्ध का ऐलान नहीं करेगा, बल्कि दुश्मन को अंदर से खोखला कर देगा। आप इसे 'शैडो वॉर' कह सकते हैं। ये युद्ध मैदान में नहीं, बल्कि अंधेरे कमरों और कंप्यूटर स्क्रीन पर लड़ा जा रहा है।
अगर आप वैश्विक राजनीति पर नज़र रखते हैं, तो आपको ये समझना होगा कि ताकत सिर्फ हथियारों में नहीं, बल्कि सही वक्त पर सही जगह स्ट्राइक करने में है। अमेरिका ने ये बात 2011 में भी साबित की थी और वो आज भी यही कर रहा है। नज़र इस बात पर रखिए कि ईरान के अंदर अगले कुछ महीनों में क्या होता है, क्योंकि अमेरिका की ये बिसात अभी और खतरनाक होने वाली है।
ईरान की स्थिति को समझने के लिए आपको केवल उसके परमाणु कार्यक्रम को नहीं देखना चाहिए, बल्कि उन छोटी-छोटी घटनाओं को जोड़ना चाहिए जो लादेन के अंतिम दिनों की याद दिलाती हैं। चाहे वो गुप्त हत्याएं हों या अचानक होने वाले धमाके, स्क्रिप्ट वही पुरानी है, बस किरदार बदल गए हैं। आप इस खेल को शतरंज की तरह देखें जहाँ राजा को घेरने के लिए प्यादों को धीरे-धीरे हटाया जा रहा है।